इस गांव में हर घर में है फौजी, खुद शहीद की अस्थियां लेकर आईं थीं इंदिरा गांधी
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इस गांव में हर घर में है फौजी, खुद शहीद की अस्थियां लेकर आईं थीं इंदिरा गांधी

गाजीपुर: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के गहमर गांव को फौजियों का गांव कहते हैं. इस गांव में कई पीढ़ियों से देश सेवा के लिए फौजी बनना एक परम्परा बन चुकी है. गहमर का हर युवा आज भी फौजियों के गांव की इस परम्परा की विरासत को पूरे जिम्मेदारी से संभाले हुये हैं. गाजीपुर में फौजियों का ये गांव जहां एशिया में सबसे बड़ा गांव है, वहीं औसतन हर घर में एक सैनिक इस गांव की शान बढ़ा रहा है.

गाजीपुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर गंगा किनारे बसा गहमर एशिया का सबसे बड़ा गांव माना जाता है, जिसकी कुल आबादी एक लाख बीस हजार है. तकरीबन 25 हजार मतदाताओं वाला गहमर 8 वर्ग मील में फैला हुआ है. गहमर 22 पट्टियों या टोले में बंटा है. ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि सन 1530 में कुसुम देव राव ने सकरा डीह नामक स्थान पर गहमर गांव बसाया था. गहमर में ही प्रसिद्ध कामख्या देवी मंदिर भी है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत बिहार के लोगों के लिए आस्था का बड़ा केन्द्र है. लेकिन गहमर की सबसे बड़ी पहचान है यहां के हर घर में एक फौजी से.

गांव वाले मां कामाख्या को अपनी कुल देवी मानते हैं और देश सेवा को अपना सबसे बड़ा फर्ज. गहमर गांव के औसतन हर घर से एक पुरुष सेना में कार्यरत है. गांव के हर घर में फौजियों की तस्वीरें, वर्दियां और सेना के मेडल फौजियों के इस गांव की कहानी खुद ही बयान कर देती हैं. वर्तमान में गहमर के 12 हजार से अधिक लोग भारतीय सेना के विभिन्न अंगों में सैनिक से लेकर कर्नल तक के पदों पर कार्यरत हैं. जबकि 15 हजार से ज्यादा भूतपूर्व सैनिक गांव में रहते हैं. बताया जाता है कि सैन्य सेवा को लेकर गहमर की ये परम्परा प्रथम विश्व युद्ध से शुरु हुई. द्वितीय विश्व युद्ध में गहमर के 226 सैनिक अंग्रेजी सेना में शामिल रहे, जिसमें से 21 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुये थे.

गहमर के सैनिकों ने सन 1962,1965 और 1971 के युद्धों में भी भारतीय सेना के लिए अपने हौंसले और जज्बे के दम पर मोर्चा संभाला था. देश सेवा इस गांव के हर बांशिदे के लिए सबसे बड़ी गर्व की बात है. फौजियों के इस गांव की एक सच्चाई ये भी है कि आजादी के बाद से आज तक गहमर के सैनिक विभिन्न युद्धो में अपनी वीरता और शौर्यता का परचम तो फहराते रहे, लेकिन आज तक कोई भी शत्रु सेना उनका बाल भी बांका नही कर पायी. गहमर के लोगों की मान्यता है कि उनकी कुल देवी मां कामख्या हर मोर्चे पर गहमर के अपने बेटों की रक्षा स्वयं करती हैं.

अस्थि कलश लेकर खुद गांव आईं थीं इंदिरा गांधी

1965 के युद्ध में सैदपुर के कैप्टन सुखवीर सिंह दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुए. जिसके बाद इंदिरा गांधी खुद शहीद की अस्थि कलश लेकर सैदपुर गांव में आईं. 1971 के युद्ध मे एक ही दिन गांव के मोहन सिरोही व विजय सिरोही शहीद हुए थे. तब इंदिरा गांधी PM रहते हुए भी गांव में आईं थीं.

यूपी के गाजीपुर जिले के गहमर गांव को पूरे देश में फौजियों के गांव के रुप में पहचाना जाता है. गहमर का हर युवा होश संभालते ही देश सेवा के लिए सेना में भर्त्ती होने के लिए अभ्यास शुरु कर देता है. फौजियों के इस गांव में युवाओं का मकसद सैनिक बनकर देश सेवा ही होता है. पूरा गांव अपने इस जज्बे पर गर्व भी महसूस करता है.